लोग प्रकाशी को नाम से कम और बंदूक वाली दादी के नाम से ज्यादा जानते है। शुरू-शुरू में प्रकाशी चुपचाप निशानेबाजी सीखने लगी लेकिन कुछ ही दिनों मे गांव में सबको पता चल गया कि दादी पर भी निशानेबाजी का भूत सवार हो गया है।

प्रकाशी दादी ने कई प्रतियोगिताओ में हिस्सा लिया है और करीब 20 मेडल जीत चुकी है। दादी की हिम्मत का फल है की अब इस गांव की अगली पीढ़ी में भी कई और निशानेबाज तैयार हो रहे है। दादी को देख और भी महिलाए इस खेल को अपनाकर कई स्पर्धाओं में भाग ले रही हैं। अब आंखें कमजोर होने की वजह से प्रकाशी अब प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं लेती, लेकिन 12 से 24-25 साल तक के निशानेबाजों के लिए उनकी मुफ्त की कोचिंग चलती रहती है। प्रकाशी तोमर की बेटी सीमा भी इंटरनैशनल लेवल की शूटर हैं।

 

 

 

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